Friday, 7 March 2008
मैया मे टू चंदर खिलौना ले हूं
Monday, 19 November 2007
अगर इतिहास को रचनात्मक होना है - हावर्ड ज़िन
www.pnnhindi.com
पीएनएन हिन्दी .
यह निबंध हावर्ड ज़िन की सिटी लाइट्स द्वारा प्रकाशित नई किताब "वह ताकत जिसे सरकार नहीं दबा सकती" का पहला अध्याय है
.अमेरिका का भविष्य इससे जुड़ा है कि हम अपना अतीत किस तरह समझते हैं। इसी कारण मेरे लिए इतिहास लिखना कभी एक तटस्थ कर्म नहीं रहता। लिख कर मैं नस्लवादी अन्याय, लैंगिक पक्षपात, वर्गों की ग़ैर-बराबरी, तथा राष्ट्रीय दर्प के बारे में व्यापक जागरूकता लाने की उम्मीद करता हूँ। मैं जनता द्वारा प्रतिष्ठान के विरुद्ध दर्ज न किए गए प्रतिरोध को भी सामने लाना चाहता हूँ: आदिवासियों का एकदम गायब हो जाने से मना करना; गुलामी के विरुद्ध आंदोलन में तथा हाल के रंगभेदी अलगाव के विरुद्ध आंंदोलन में अश्वेत लोगों का विद्रोह; कामगारों के द्वारा अपना जीवन सुधारने के लिए अमरीका के पूरे इतिहास में की गई हड़तालें।प्रतिरोध की इन कार्यवाहियों को नज़रअंदाज़ करने का मतलब है इस शासकीय मत का समर्थन करना कि ताकत केवल उन्हीं के पास हो सकती है जिनके पास बंदूकें हैं तथा जिनका धन-संपत्ति पर कब्ज़ा है। मैं इसलिए लिखता हूँ कि एक बेहतर दुनिया के लिए संघर्ष कर रहे लोगों की रचनात्मक शक्ति को रोशनी में ला सकूँ। लोगों के पास, यदि संगठित हों तो, ज़बरदस्त ताकत होती है, किसी भी सरकार से ज़्यादा। हमारा इतिहास उन लोगों की कहानियों से भरा पड़ा है जो विरोध में खड़े होते हैं, हिम्मत करके बोलते हैं, अड़ जाते हैं, संगठन बनाते हैं, जुड़ते हैं, प्रतिरोध के जाल बनाते हैं, और इतिहास की धारा को बदल देते हैं।मैं जन आंदोलनों की काल्पनिक जीतों की खोज नहीं करना चाहता। लेकिन यह सोचना कि इतिहास लेखन को केवल अतीत पर छाई हुई असफलताओं को याद दिलाना चाहिए, इतिहासकारों को हार के अंतहीन चक्र में शामिल कर लेने जैसा है। अगर इतिहास को रचनात्मक होना है, अतीत को नकारे बिना संभावित भविष्य के लिए तैयार होना है, तो मेरा मानना है कि उसे नई संभावनाओं पर ज़ोर देना चाहिए, अतीत की उन छिपी हुई घटनाओं को सामने लाकर, चाहे छोटी-छोटी झलकों में ही, जब लोगों ने अपनी प्रतिरोध की, साथ जुड़ने की, और कभी-कभी जीतने की भी क्षमताएँ प्रदर्शित की हैं। मैं मान रहा हूँ, या शायद उम्मीद कर रहा हूँ, कि हमारा भविष्य हमें अतीत के सहृदय शरणार्थी लम्हों में मिलेगा, न कि उसकी युद्घों से भरी ठोस सदियों में।इतिहास हमारे संघर्ष में मदद कर सकता है, निर्णायक रूप से नहीं भी तो कम से कम रास्ता सुझाने के लिए। इतिहास हमें इस विचार से छुटकारा दिला सकता है कि सरकार के हित और जनता के हित एक ही होते हैं। इतिहास हमें बता सकता है कि सरकारें हम से किस तरह झूठ बोलती रही हैं, किस तरह पूरी आबादियों के नरसंहार का आदेश देती रही हैं, किस तरह वे गरीबों के अस्तित्व को ही नकार देती हैं, किस तरह वे हमें हमारे वर्तमान ऐतिहासिक क्षण तक ले आई हैं - "लंबा युद्ध," बिना अंत का युद्ध।यह सच है कि हमारी सरकार के पास देश का धन जैसे चाहे खर्च करने की ताकत है। वह दुनिया में कहीं भी फौजें भेज सकती है। वह उन दो करोड़ आप्रवासियों की गिरफ़्तारी और निष्कासन का आदेश दे सकती है जिनके पास ग्रीन कार्ड नहीं है और जिन्हें कोई संवैधानिक अधिकार भी नहीं मिले हुए हैं। हमारे "राष्ट्रीय हितों" के नाम पर सरकार सैनिकों को अमरीका-मैक्सिको सीमा पर तैनात कर सकती है, कुछ देशों से मुस्लिमों को पकड़ कर ला सकती है, खुफ़िया तौर पर हमारी बातें सुन सकती है, हमारी ई-मेल खोल के देख सकती है, बैंकों में हमारे लेन-देन को देख सकती है, और हमें डरा कर चुप कराने की कोशिश कर सकती है। सरकार डरपोक मीडिया के सहयोग से सूचना को नियंत्रित कर सकती है। सिर्फ इसी कारण जॉर्ज डब्ल्यू. बुश की लोकप्रियता (जिनसे पूछा गया उनका 33%) - 2006 तक आते-आते घटती हुई, पर फिर भी काफी - बनी हुई है। लेकिन यह नियंत्रण हमेशा के लिए नहीं है। यह बात कि मीडिया का 95% ईराक पर कब्ज़ा बनाए रखने के पक्ष में है (ऐसा कैसे किया जाए इसकी केवल ऊपरी निंदा करते हुए), जबकि 50% से ज़्यादा जनता वापसी के पक्ष में है, दिखाती है कि शासकीय झूठों के प्रति सामान्य बोध पर आधारित विरोध मौजूद है। यह भी ध्यान रखने की बात है कि जनमत (अपने स्वभाव के अनुसार) कितने नाटकीय तरीके से अचानक बदल सकता है। याद करें कि बड़े जॉर्ज बुश के लिए जन समर्थन कितनी तेज़ी से खत्म हो गया था जैसे ही खाड़ी युद्ध में जीत की गर्मी कम हुई थी और आर्थिक परेशानियों की असलियत सामने आ गई थी।याद करें कि वियतनाम युद्ध के शुरू में किस तरह 1965 में दो-तिहाई अमरीकन युद्ध के पक्ष में थे। कुछ ही वर्ष बाद दो-तिहाई अमरीकन युद्ध का विरोध कर रहे थे। उन तीन या चार वर्षों में ऐसा क्या हो गया? धीरे-धीरे प्रॉपेगंडा तंत्र की दरारों से सच का रिसना - यह समझना कि हमसे झूठ बोला गया था, हमें धोखा दिया गया था। जब मैं यहाँ अमरीका में 2006 की गर्मियों में यह लेख लिख रहा हूँ, तब भी यही हो रहा है। घबरा जाना, या इस बात को अपने ऊपर हावी होने देना कि युद्ध पैदा करने वालों के पास ज़बरदस्त ताकत है, आसान है। लेकिन कुछ ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य उपयोगी हो सकता है, क्योंकि यह हमें बताता है कि इतिहास में ऐसे बिन्दु भी होते हैं जब सरकारों को पता चलता है कि उनकी सारी ताकत जागरूक हो चुके नागरिकों के विरुद्ध बेकार है।सरकारों में एक मूलभूत कमज़ोरी होती है, चाहे उनके पास कितनी ही ढेर सारी सेनाएँ हों, चाहे कितनी ही दौलत उनके पास हो, चाहे छवियों और सूचना पर उनका नियंत्रण हो, क्योंकि उनकी ताकत नागरिकों, सैनिकों, अफ़सरों, तथा पत्रकारों और लेखकों और अध्यापकों और कलाकारों के आज्ञाकारी होने पर निर्भर करती है। जब नागरिकों को यह शक होने लगता है कि उन्हे धोखा दिया गया है और वे समर्थन वापस ले लेते हैं, तब सरकार की वैधता और उसकी शक्ति खत्म हो जाती है।पिछले दशकों में हमने पूरे विश्व में यह सब होते देखा है। एक दिन जागने पर राजधानी की गलियों में लाखों गुस्साए लोगों को देख कर देश के नेताओं को अपना बोरिया-बिस्तर बांधते हुए और एक हेलीकॉप्टर की पुकार करते हुए। यह फ़ंतासी नहीं है; यह अभी हाल ही का इतिहास है। यह इतिहास है फ़िलीपीन का, इंडोनेशिया का, यूनान का, पुर्तगाल और स्पेन का, रूस, पूर्वी जर्मनी, पोलैंड, हंगरी तथा रोमानिया का। अर्जेंटीना और दक्षिण अफ्रीका और उन तमाम जगहों के बारे में सोचें जहाँ बदलाव होना असंभव लग रहा था पर हो गया। निकारागुआ में सोमोज़ा को अपने हवाई जहाज की तरफ दौड़ते हुए याद करें, फ़र्डीनांड और इमेल्डा मार्कोस को जल्दी-जल्दी अपने गहने और कपड़े संभालते हुए याद करें, ईरान के शाह को हताशा के साथ उस देश की खोज करते हुए याद करें जो उसे लेने को तैयार हो जबकि वह तेहरान में भीड़ से बचने के लिए भाग रहा था, हेती में दुवालिये को वहाँ की जनता के कोप से बचने के लिए मुश्किल से पतलून पहनते हुए याद करें।हम यह उम्मीद तो नहीं कर सकते कि जॉर्ज बुश को हेलीकॉप्टर में भागना पड़े। पर हम उन्हें राष्ट्र को दो युद्धों में ढकेलने के लिए, इस देश तथा अफ़ग़ानिस्तान व ईराक़ मे दसियों हज़ार मनुष्यों की मृत्यु या उनके विकलांग होने के लिए, और अमरीकी संविधान तथा अंतर्राष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के लिए ज़िम्मेदार तो ठहरा सकते हैं। निश्चय ही ऐसी कार्यवाहियाँ महाभियोग के लिए "भारी अपराध तथा कुकृत्य" कहलाने लायक हैं।और देश भर में लोगों ने वास्तव में उनके विरूद्ध महाभियोग लगाने की मांग करना शुरू कर भी दिया है। हाँ, बुजदिल कांग्रेस से तो हम उन पर महाभियोग लगाने की उम्मीद नहीं ही कर सकते। कांग्रेस एक इमारत में अवैध प्रवेश करने के लिए निक्सन पर महाभियोग चलाने को तैयार थी, पर वो एक देश में अवैध प्रवेश के लिए बुश पर महाभियोग नहीं चलाएगी। वे क्लिंटन पर यौन कारनामों के लिए महाभियोग चलाने को तैयार थे, पर वे एक देश की धन-संपत्ति को महाधनियों के हवाले करने के लिए बुश पर महाभियोग नहीं चलाएंगे।बुश प्रशासन की तसल्ली को लगातार भीतर ही भीतर एक कीड़ा खा रहा है: अमरीकन जनता की यह जानकारी - बहुत कम गहरी कब्र में दफ़न की हुई, आसानी से बाहर लाई जा सकने वाली - कि उसकी सरकार जनमत से नहीं बल्कि एक राजनैतिक तख्ता पलट से सत्ता में आई थी। इसलिए हो सकता है कि हम इस प्रशासन की वैधता को धीरे-धीरे विखंडित होते हुए देख रहे हों, इसके चरम आत्मविश्वास के बावजूद। साम्राज्यवादी ताकतों के अपनी जीतों पर इतराने का लंबा इतिहास है, अपनी पहुँच से ज्यादा खिंच जाने का और दुस्साहसी बन जाने का, और यह न समझने का कि ताकत सिर्फ़ हथियारों और पैसे से नहीं होती। सैनिक ताकत की अपनी सीमा होती है - मानवों द्वारा निर्धारित सीमा, उनके न्याय बोध तथा प्रतिरोध की क्षमता से निर्धारित सीमा। अपने 10,000 नाभिकीय बमों के बावजूद संयुक्त राज्य अमरीका कोरिया या वियतनाम में युद्ध नहीं जीत सका, क्यूबा या निकारागुआ में क्रांति को नहीं रोक सका। इसी तरह सोवियत संघ को अपने नाभिकीय बमों तथा विशाल सेना के बावजूद अफ़ग़ानिस्तान से लौटने के लिए बाध्य होना पड़ा।सैनिक शक्ति से लैस देश विनाश तो कर सकता है पर निर्माण नहीं कर सकता। इसके नागरिक व्यग्र हो रहे हैं क्योंकि उनकी मौलिक दैनिक ज़रूरतों को सैनिक गौरव के लिए बलि चढ़ाया जा रहा है जबकि उनके युवा बच्चों का ख्याल नहीं रखा जा रहा और उन्हें युद्ध में भेजा जा रहा है। उनकी व्यग्रता रोज़ बढ़ती जा रही है और नागरिक अधिकाधिक संख्याओं में इकट्टे हो रहे हैं, इतने कि उनको नियंत्रण में रखना मुश्किल होता जा रहा है; एक न एक दिन ऊपर से भारी साम्राज्य गिर पड़ते हैं। जन चेतना में बदलाव हल्के असंतोष से शुरू होता है, शुरू में अस्पष्ट सा, सरकार की नीतियों और असंतोष में बिना कोई संबंध समझे। फिर बिन्दु जुड़ने लगते हैं, नाराज़गी बढ़ने लगती है, और लोग विरोध में बोलने लगते हैं, संगठित होने लगते हैं, तथा विरोध की कार्यवाहियाँ शुरू कर देते हैं।आज, जब संघ के हर राज्य में बजट में कमी की जा रही है, पूरे देश में अध्यापकों, नर्सों, चिकित्सा, तथा सस्ते घरों का अभाव महसूस हो रहा है। एक अध्यापक ने हाल ही में बॉस्टन ग्लोब को लिखा: "मैं बॉस्टन के उन 600 अध्यापकों में से हो सकता हूँ जिन्हें बजट में कमी के कारण नौकरी से निकाला जाने वाला है।" फिर यह पत्र लेखक इस बात को बमों पर खर्च किए गए पैसे से जोड़ता है जिसे, उसके शब्दों में, "मासूम ईराक़ी बच्चों को बग़दाद में अस्पताल भेजने के लिए लगाया जा रहा है।"जब सरकारों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, सेनाओं तथा पुलिस की दिमागों को नियंत्रित करने, असहमति को कुचलने, और विद्रोह को नष्ट करने की विशाल ताकत हमारी सोच पर हावी हो जाए तब हमें कुछ ऐसी चीज़ों पर ध्यान देना चाहिए जो मुझे रोचक लगती हैं। जिनके पास इतनी भारी ताकत है वे इस ताकत पर अपनी पकड़ बनाए रखने के बारे में आश्चर्यजनक रूप से चिंतित हैं। उनकी प्रतिक्रिया विरोध के बहुत ही छोटे और निरापद से दिखने वाले आसारों की तरफ भी लगभग हिस्टीरियाई होती है।हम ताकत की हज़ार परतों से लैस अमरीकी सरकार को देख सकते हैं, कुछ शांतिवादियों को जेल में डालने या किसी लेखक को देश से बाहर रखने के लिए कड़ी मेहनत करते हुए। हम व्हाइट हाउस के सामने धरना दे रहे अकेले आदमी की तरफ निक्सन की हिस्टीरियाई प्रतिक्रिया को याद कर सकते हैं: "इसे पकड़ो!"क्या ऐसा संभव है कि जो लोग सत्ता में हैं वो कुछ ऐसा जानते हैं जो हम नहीं जानते? शायद वे अपनी सीमाएँ जानते हैं। शायद वो समझते हैं कि छोटे आंदोलन ही बड़े आंदोलन बन सकते हैं, कि जो विचार जनता में अपनी जगह बना ले उसे मिटाया नहीं जा सकता। लोगों को युद्ध का समर्थन करने, दूसरों का दमन करने के लिए राज़ी किया जा सकता है, पर इस तरफ उनका स्वाभाविक झुकाव नहीं होता। कुछ लोग "पहले पाप" की बात करते हैं। कुर्त वॉनेगट उसको चुनौती देते हुए "पहले पुण्य" की बात करते हैं।इस देश में लाखों लोग हैं जो वर्तमान युद्ध के विरुद्ध हैं। जब आप एक आँकड़ा देखते हैं "40% अमरीकन लोग युद्ध का समर्थन करते हैं," तो उसका मतलब होता है कि 60% अमरीकन समर्थन नहीं करते। मुझे यकीन है कि युद्ध का विरोध करने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जाएगी जबकि युद्ध समर्थकों की संख्या घटती जाएगी। इस रास्ते पर कलाकार, संगीतकार, लेखक, और सांस्कृतिक कार्यकर्ता शांति व न्याय के लिए आंदोलन को एक खास भावनात्मक तथा आध्यात्मिक ताकत दे सकते हैं। विद्रोह अक्सर एक सांस्कृतिक चीज़ के रुप में शुरू होता है।चुनौती अब भी बाकी है। विरोधी पक्ष के पास बहुत सी ताकतें हैं: पैसा, राजनैतिक शक्ति, अधिकतर मीडिया। हमारी तरफ है दुनिया की जनता और पैसे व हथियारों से बड़ी एक ताकत: सच। सच की अपनी ताकत होती है। कला की अपनी ताकत होती है। संयुक्त राज्य तथा सभी जगहों में जन संघर्षों का असली मतलब है वही युगों पुराना पाठ - कि हम जो भी करते हैं उससे फ़र्क पड़ता है। एक कविता एक आंदोलन की प्रेरणा बन सकती है। एक पर्चा क्रांति के लिए चिनगारी बन सकता है। नागरिक असहयोग लोगों को जगा सकता है और हमें सोचने के लिए उकसा सकता है। जब हम एक-दूसरे के साथ संगठित हो जाते हैं, जब हम शामिल हो जाते हैं, जब हम खड़े होकर साथ बोलने के लिए तैयार हो जाते हैं, तब हम ऐसी ताकत पैदा कर सकते हैं जिसे कोई सरकार दबा नहीं सकती। हम रहते तो एक खूबसूरत देश में हैं। लेकिन ऐसे लोगों ने इस पर कब्ज़ा कर लिया है जो मानव जीवन, आज़ादी या न्याय की कोई कद्र नहीं करते। अब यह हमारा काम है कि हम इसे दुबारा पा लें।
अनुवादक: अनिल एकलव्य/ साभार - जेडनेट
दलितों पर बढ़ता उत्पीड़न - राजु कुमार
www.pnnhindi.com
पीएनएन हिन्दी .
हाल के दिनों में प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति में बहुत ही गिरावट आई है, खासतौर से दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है। नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी ने एक पत्रकार वार्ता में प्रदेश में बढ़ रही दलित उत्पीड़न की घटनाओं को उजागर किया। भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने भी कानून-व्यवस्था की बदतर स्थिति पर चिंता जाहिर की है। वे इस मुद्दे पर अनशन पर बैठने वाले थे, पर मुख्यमंत्री से चर्चा के बाद उन्होंने अपने विचार बदल लिए। बाद में इसी मुद्दे पर कांग्रेस नेता पी.सी. शर्मा अनशन पर बैठे। विधान सभा के पावस सत्र में प्रदेश में दलित उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं का मुद्दा विपक्ष ने उठाया था। इस आरोप का पुरजोर विरोध सता पक्ष ने किया था। विपक्ष ने इस मुदे पर सरकार को घेरने की कोशिश की थी पर उन्हे सफलता नहीं मिली थी। विपक्ष एक बार फिर इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा हैं।.यद्यपि यह सही है कि प्रदेश मे दलित उत्पीड़न एक गंभीर मुद्दा है, खासतौर से उस स्थिति मे जब सरकार ने आम जन से भय, भूख एवं भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने का वायदा किया है। वर्तमान सरकार ने अपने कार्यकाल के साढे तीन वर्षो से ज्यादा का सफर पूरा कर लिया है और प्रदेश में अगले वर्ष 2008 में विधानसभा के चुनाव भी होने वाले हैं। पर उत्तारोतर प्रदेश में भय का वातावरण बढ़ता जा रहा है। यदि सिर्फ दलित उत्पीड़न की घटनाओं को देखा जाए तो पिछले दो तीन वर्षो में दलितों का समाजिक बहिष्कार, दलित महिलाओं के साथ बलात्कार, उनकी बेदखली आदि कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जो बहुत ही शर्मनाक हैं। ऐसी घटनाओं का सिलसिला थमा नहीं है और प्रदेश के कर्इ्र हिस्सों में दलितो पर अत्याचार होने की जानकारी मिल रही है। ऐसी घटनाओं की जानकारी भी हमें तभी होती है जब उत्पीड़ित दलित किसी तरह जिला प्रशासन तक पहुँच पाते हैं या उनके बारे मे किसी स्रोत से देर-सवेर जानकारी मिलती है। घटनाएं जब हमारे सामने होती हैं तब वह कई दिन पुरानी भी हो चुकी होती है।.कुछ दिन पूर्व ही सागर जिले के रहली थाना क्षेत्र के भैसा गांव मे एक दलित परिवार के घर कन्याभोज आयोजित किया गया था। गांव के हनुमान मंदिर मेें भोज का भोग लगाने गए दलित समुदाय के साथ ऊॅची जाति के दबंगो ने मारपीट की और उन्हे धमकी देकर गांव से भगा दिया। इस घटना में गांव से 15 महिलाओं सहित 43 दलित बहिष्कृत हो गए। गांव के हैण्डपंप से उन्हें पानी भरने से भी रोक दिया गया। इसी तरह की घटनाक्रम में उज्जैन जिले के झरनावदा गांव में सवर्णों ने एक दलित युवक को खम्बे से बांधकर पिटाई की। उज्जैन के ही चापानेरा गांव में सवर्णों ने एक दलित महिला को अर्ध्दनग्न कर गदहे पर बैठाकर घुमाया। गुना जिले के उमरियाखुर्द गांव के एक दलित परिवार को गांव के दबंगों ने गांव से खदेड़कर उनके घर मे आग लगा दी। इस घटना में दलित परिवार को पट्टे में मिली जमीन पर दबंगों ने कब्जा करने की कोशिश की थी। इसी तरह दबंगों ने एक दलित महिला के साथ कुकृत्य करने के प्रयास से मारपीट की और उसे बचाने पहुंची अन्य महिलाओं को भी दबंगों ने पीटा। घटना के बाद से उस महिला का पूरा परिवार गांव से बाहर है और डर से गांव नहीं लौट रहा है।.इन घटनाओं के पीछे जो कारण उभरकर सामने आते हैं, वे यह दर्शाते हैं कि समाज में अभी भी सामंती मानसिकता कायम है और दलित समुदाय बहिष्कृत जीवन जीने को विवश है। दलिताें को शेष समाज के साथ भेदभाव रहित जीवन जीने के लिए किए जा रहे सरकारी एवं गैर सरकारी प्रयासों के बावजूद उनके सामाजिक बहिष्कार के नए नए रूप देखने को मिल रहे हैं। अब दलितों पर सीधे प्रहार नहीं किया जाता, बल्कि उन पर कई आरोप लगा दिए जाते हैं, मसलन- दलित युवा ने सवर्ण महिलाओं से छेड़छाड़ की है या करने का प्रयास कर रहा था, वह शराबी था जिससे गांव का माहौल खाराब हो रहा था, सवर्णों का दलिताें द्वारा विरोध किया जा रहा था आदि और फिर उसके बाद उन पर हमला किया जाता है। ऐसे आरोपों का निराधार होना अचरज की बात नहीं, क्याेंकि ऐतिहासिक रूप से हाशिये पर पड़े दलितों की सामाजिक हैसियत अभी भी निम्न है और प्रशासन, पैसा और सत्ताा के गठजोड़ में सवण्र्ाो की तुलना मे वे कहीं नहीं टिकते।.प्रदेश में घट रही इन घटनाओं को रोकने के लिए किए जा रहे प्रयास नाकाफी दिखते हैं। एक ओर दलित सामाजिक एवं राजनीतिक रूप से बहिष्कृत हैं और दूसरी ओर उन पर हुए अत्याचारों की कोई सुनवाई नहीं हो रही हैं। स्थानीय पुलिस प्रशासन से उन्हें मदद नहीं मिल पा रही है, उल्टे उन्हें वहां से झिड़कियां मिल रही हैं। कुछ ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जिनमें दलितों एवं कमजोर तबके के लोगों को झूठे केसों में फंसाने की धमकी दी जा रही है। ऐसे मामलों में वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा सख्ती नहीं किये जाने से अपराधियों के हौसले बढ़ रहे हैं।.उपरोक्त परिस्थितियों को देखकर लगता है कि राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति गंभीर है पर सरकार इन मामलों में उदासीन रवैया ही अपना रही है। सरकार यह दावा तो कर रही है कि प्रदेश को भयमुक्त बनाना है पर सरकार द्वारा ली गई इस जिम्मेदारी का परिणाम दिख नही रहा है और दलितो का उत्पीड़न जारी है। स्थानीय पुलिस प्रशासन को दलितों के उत्पीड़न पर अंकुश लगाने के लिए कठोर निर्देश नहीं दिए जाने एवं ऐसी घटनाओं में प्रशासन की जवाबदेहिता तय नहीं होने के कारण ही यह देखने में आता है कि किसी उच्च अधिकारी द्वारा बिना दखल दिए, थानों में दलितों एवं कमजोर तबकों की सुनवाई नहीं होती उल्टे उन्हे वहां से भी प्रताड़ना ही मिल रही है।
जागीर में मिलता है मैला ढोने का काम - सचिन कुमार जैन
बरोठा गांव की सुमित्रा बाई जब शादी होकर अपनी ससुराल पहुंची थी तब उनकी सास ने उन्हें अपनी जागीर सौंप दी थी; और उन्हें जागीर में मिला था 25 घरों का मैला ढोने का काम। असभ्य समाज में भी इस तरह की प्रथा का प्रचलन नहीं था पर विकसित होते समाज में बदस्तूर ऐसी प्रथा का पालन किया जा रहा है जिसमें इंसान से ही इंसान का मल साफ करवाया जा रहा है। इसी व्यवहार के सम्बन्ध में अब तक किये गये प्रयासों से यह मान्यता स्थापित होती गई है कि यदि एक समुदाय मानव मल ढोने का काम कर रहा है तो इसका सबसे बड़ा कारण आर्थिक अभाव नहीं बल्कि सामाजिक असंवेदनशीलता और प्रतिबध्दता की कमी है।.सुमित्रा बाई ने खुद को इस पेशे के चक्रव्यूह में से बाहर निकालने की जध्दोजहद की। अब से दो साल पहले उन्होंने मैला ढोने का काम बंद कर दिया था। उन्हें अन्त्यावसायी योजना के अन्तर्गत राष्ट्रीयकृत बैंक से वैकल्पिक रोजगार के लिये 20 हजार रूपये का ऋण भी मिला। वह खुश थीं कि अब उनके बच्चों को समाज में सम्मान मिलेगा और वह बेहतर जीवन जी पायेंगी। सुमित्रा बाई ने ऋण राशि से गांव में कपड़े की दुकान खोली; परन्तु मुक्ति का वह रास्ता किसी अंधेरी गुफा में जा पहुंचा। तीन माह तक हर रोज सुमित्रा बाई बड़ी उम्मीद के साथ दुकान खोलती, पर इस दौरान गांव के किसी व्यक्ति ने उनके यहां से कपड़े का एक टुकड़ा तक नहीं खरीदा। गांव में यह बात प्रचलित हो गई कि सुमित्रा बाई मसान के कपड़े बेच रही है। आखिरकार उन्हें अपनी दुकान बंद कर देना पड़ी और एक सुखद सपने का शुरूआत से पहले ही अंत हो गया। डेढ़ साल तक फिर भी वह अन्य विकल्पों की तलाश करती रही पर उन्हें निराशा ही हाथ लगी और सुमित्रा बाई को एक बार फिर कच्चे शौचालयों की सफाई के काम की ओर कदम बढ़ाने पड़े।.पहले एक प्रशासनिक अधिकारी और अब सामाजिक कार्यकर्ता की हैसियत से इस मुद्दे पर काम कर रहे हर्षमन्दर कहते हैं कि यह सम्मान और गरिमा का सवाल है; कोई आर्थिक मदद या सरकारी योजना इसका जवाब नहीं खोज सकती है। अभी तक हम योजना आधारित पुनर्वास की कोशिशें करते रहे हैं जबकि जरूरत सामाजिक बदलाव की है। इसमें दो तरफा पहल की जरूरत है, एक तो मैला ढोने के काम में लगे लोग इस काम को छोडेंे अौर दूसरे स्तर पर समाज उन्हें समानता का दर्जा देते हुए बिना किसी भेदभाव के स्वीकार करें। विगत एक दशक में सरकार 144 करोड़ रूपये खर्च करके भी इन परिवारों को अमानवीय पीड़ा से मुक्ति नहीं दिला पाई है। उनके दावों का अब भी कोई आधार नहीं है, न ही वे अपने काम को जवाबदेय ही मानते हैं। मध्यप्रदेश में दलित समानता के लिए की गई पहल को दुनिया भर में ख्याति मिली है और राज्य सरकार के उसी दलित एजेण्डे में यह स्पष्ट रूप से दावा किया गया था कि अप्रैल 2003 तक प्रदेश के सभी शौचालयों को जलवाहित शौचालयों में बदलने का काम पूर्ण कर लिया जायेगा; परन्तु आज की स्थिति में भी मध्यप्रदेश में 78 हजार से ज्यादा शुष्क शौचालय हैं जिनमें मैला साफ करने में अठारह हजार लोग लगे हुए हैं।.राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अनुसार भी मध्यप्रदेश के 16 जिलों में अभी व्यापक रूप से यह प्रथा प्रचलन में है। सबसे अहम् बात यह है कि सरकार के स्तर पर किये गये प्रयासों में अभी भी सामाजिक सोच में बदलाव की कोशिशों का पूर्णत: अभाव है, और तो और उन्हें व्यवस्था की मदद भी नहीं मिल पा रही हैं। शासन की कल्याणकारी योजना के अनुसार अस्वच्छ पेशों में संलग्न परिवारों के बच्चों को शिक्षा के लिए हर वर्ष साढ़े सात सौ रूपये की छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है परन्तु धरातल पर यह योजना विसंगति पूर्ण परिणाम दे रही हैं पन्ना जिले के बिसानी गांव की तीन महिलाओं ने जब यह पेशा छोड़ा तो उन्हें प्रोत्साहन मिलना तो दूर तत्काल उनके बच्चों को मिलने वाली छात्रवृत्ति बंद कर दी गई। उनमें से एक अनिता वाल्मिकी कहती हैं कि उस छात्रवृत्ति से कम से कम बच्चों की किताबें और कपड़े तो आ ही जाते थे परन्तु अब तो वह मदद भी बंद हो गई। सरकार मानती है कि मैला ढोने का काम बंद करते ही उन्हें दूसरे अच्छे काम मिल जाते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि ऐसा करने से उनके दूसरे विकल्प भी छिन जाते हैं। देवास जिले की बागली तहसील की शांतिबाई कहती हैं कि हमें इस काम के एवज में हर घर से एक बासी रोटी और त्यौंहारों पर पुराने कपड़े मिलते थे। हम तो उनके गुलाम जैसे थे इसलिये काम करवाने वाले हमारी कुछ मदद भी कर देते थे परन्तु जबसे यह काम छोड़ा है तब से हमारा तो जैसे सामाजिक बहिष्कार हो गया है। अब जरूरत पड़ने पर भी जब हम सवर्णों से रोटी या अन्य मदद मांगने जाते हैं तो एक भी परिवार हमारी मदद नहीं करता है। इतना ही नहीं शांति बाई को यह कहकर मजदूरी पर नहीं लगाया गया कि तुम तो मैला ढोने वाले हो तुमसे मजदूरी कैसे होगी ? देवास के गंधर्वपुरी गांव की मुन्नी बाई से कहा गया कि जिन्होंने तुमसे मैला ढोने का काम छुड़वाया है अब उन्हें से जाकर मदद मांगो।.शिक्षा अब एक मौलिक अधिकार है और सरकार 14 वर्ष तक के बच्चों की नि:शुल्क शिक्षा के लिए प्रतिबध्द है। परन्तु हर जिले में सरकारी स्कूल में बच्चों से 30 रूपये प्रतिमाह शुल्क लिया जा रहा है। दलित परिवारों के सामने यह दुविधा की स्थिति है। सामाजिक संरचना पर वर्गभेद इस कदर हावी है कि व्यापक समाज यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि वाल्मिकी समाज इस अस्वच्छ पेशे से मुक्त हो। वहीं दूसरी ओर समाज (वाल्मिकी) के भीतर भी भेदभाव चरम स्तर पर है।.विकास संवाद के सचिन कुमार जैन के एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार मैला ढोने की प्रथा के उन्मूलन में लगे गरिमा अभियान के एक अध्ययन से पता चला है कि जिन 531 परिवारों का उन्होंने सर्वेक्षण मध्यप्रदेश में किया उनमें से 506 परिवारों में यह काम केवल महिलायें ही करती हैं। परम्परा यह है कि महिला विवाह के बाद जब अपने ससुराल पहुंचती है तो तत्काल उसे जागीरदारी में 20-25 घरों के मैला ढोने का काम मिलता है। अध्ययन का यह निष्कर्ष चौंकाने वाला है कि अस्पृश्यता और शोषण की पीड़ा भोग रहे दलित समुदाय की ही बलाई, चर्मकार, बरगुण्डा और बैरवा जाति के अस्सी फीसदी लोग यह मानते है कि वाल्मिकी समुदाय को यह करते रहना चाहिए क्योंकि यह उनकी जिम्मेदारी है।.वास्तव में इस व्यवसाय का आर्थिक पहलू का विश्लेषण भी अपने आप में बहुत रोचक है। अब तक यह माना जाता है कि चूंकि वाल्मिकी समाज के परिवारों को इस पेशे से आय होतीे है और इसी से वे जीवनयापन करते हैं इसलिये ये 18 हजार परिवार यह काम छोड़ना नहीं चाहते हैं। परन्तु आकलन से पता चलता है कि एक परिवार से मैला साफ करने के एवज में उन्हें 5 से 20 रूपये प्रतिमाह मिलते है। और अधिकतम 25 घरों की सफाई का काम इनके पास रहता है। इस तरह इस गरिमाहीन पेशे से उन्हें प्रतिमाह 125 से 500 रूपये की ही आय होती है और त्यौंहारों या समारोहों के मौके पर उन्हें पुराने कपड़े और मिठाई भी मिल जाती है। टोंक की रेखा बाई कहती हैं कि मैं चार सौ रूपये कमाने के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकाती हूं। वाल्मिकी समाज अकल्पनीय छुआछूत को भोगता है। आज भी गांव या कस्बे की चाय की दुकानों पर उनके लिये पानी के गिलास और चाय के कप बिल्कुल अलग रखे जाते हैं, ये कप और गिलास साबुत भी नहीं होते हैं। देवास, पन्ना, होशंगाबाद, शाजापुर, हरदा और मन्दसौर के साढ़े तीन सौ गांवों में वाल्मिकी, बलाई एवं चर्मकार समाज के लोगों के बाल वहां के नाई नहीं काटते हैं। आमलाताज गांव के विष्णु वाल्मिकी कहते हैं कि हमें दाढ़ी बनवाने और बाल कटवाने के लिये एक बार में 65 से 70 रूपये खर्च करने पड़ते हैं क्योंकि इसके लिये हमें 20 रूपये खर्च करके सोनकच्छ जाना पड़ता है, 15 रूपये दाढ़ी-कटिंग के देने होते है। और समय इतना लगता है कि 35 रूपये की मजदूरी चली जाती है। सरकारी स्तर पर अपरिपक्व नजरिये के कारण कई प्रयास सफल नहीं हो पा रहे हैं।.राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी कर्मचारी आयोग के सदस्य गिरिजा शंकर प्रसाद कहते हैं कि केन्द्र सरकार पिछले आठ सालों से लगातार राज्य सरकार को निर्देश दे रही है परन्तु यहां के प्रशासनिक अधिकारी संवेदनशीलता के साथ योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं कर रहे हैं और अब तो यह निर्देश भी जारी कर दिये गये है कि किसी जिले में एक भी व्यक्ति इस पेशे में संलग्न पाया जाता है और यदि वहां कानून के अनुसार कार्रवाई नहीं होती है तो जिलाधिकारी को इस कोताही के लिए जिम्मेदार माना जायेगा। परन्तु यह बात भी स्पष्ट है कि केन्द्र सरकार ने अब तक जारी 13 गंभीर आदेशों-दिशा निर्देशों और तीन सम्बन्धित कानूनों की निगरानी-मूल्यांकन के लिए अब तक कोई प्रयास नहीं किये हैं। स्वाभाविक है कि इस प्रथा के उन्मूलन के प्रयास में क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जिला प्रशासन की है परन्तु इस संवेदनशील प्रथा के परिप्रेक्ष्य में बहुत ही असंवेदनशील तरीके से प्रयास हुये हैं। सरकार की अन्त्यावसायी योजना के अन्तर्गत अस्वच्छ कामों में लगी महिलाओं को किसी कला या अन्य कार्य के कौशल विकास के लिये छह माह का प्रशिक्षण दिये जाने का प्रावधान है। इसी के आधार पर होशंगाबाद की सोहागपुर तहसील में 30 महिलाओं को मूर्तिकला का प्रशिक्षण दिया गया। अब तक मैला उठाने वाले हाथ इतनी जल्दी यह कला सीख नहीं पाये और उन्होंने मांग की कि उनके प्रशिक्षण की अवधि और बढ़ा दी जाये परन्तु प्रशासन ने तत्काल यह कहते हुये इस जरूरत को नजरअंदाज कर दिया कि शासन की योजनाओं मे यह प्रावधान नहीं है। परिणामस्वरूप उन महिलाओं को प्रशिक्षण मिलने के बाद भी उस सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल सका।.मध्यप्रदेश के पन्ना, देवास सहित 36 जिले दावा कर चुके हैं कि वहां मैला ढोने का काम बंद हो चुका है। जबकि वहां आज भी सत्तार हजार से ज्यादा कच्चे शौचालय मौजूद हैं। देवास के कमलापुर थाने में ही अब भी कच्चा शौंचालय हैं और मध्यप्रदेश के सभी नगरीय निकायों में साफ-सफाई के काम में इसी समुदाय के लोगों को नियुक्त किया जा रहा है। वास्तव में व्यापक समाज के स्तर पर यह मानसिकता स्थापित हो चुकी है कि अस्वच्छता से सम्बन्धित किसी भी काम में इसी समुदाय को जिम्मेदारी दी जानी चाहिये। गरिमा अभियान ने छह जिलों में अपने सघन प्रयासों से छह सौ महिलाओं को इस पेशे से मुक्त करवाया है परन्तु अब उसके सामने भी यह अनुभव उभरकर सामने आने लगा है कि मैला साफ करने का काम छोड़ने वाली महिला पर यह काम फिर से शुरू करने का दबाव बहुत बढ़ रहा है। उसके अपने आंकड़े भी हैं कि तीस महिलाओं ने फिर से यह काम अपना लिया है। कारण साफ है कि यह केवल एक पेशे को अपनाने या छोड़ने का मामला नहीं है बल्कि सामाजिक व्यवस्था के भेदवादी चरित्र को चुनौती देने का मामला हैं।
पुलिस संस्था और संस्थागत साम्प्रदायिकता - कोलिन गोंजाल्विस
2002 के गुजरात दंगों में हुई घटनाओं में पुलिस की शर्मनाक भूमिका ने एक बार फिर यह साबित किया था कि संस्थागत साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों से देश को निपटना होगा। केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा जांच के लिए गठित किये गए विभिन्न न्यायिक आयोगों के अध्ययन और अनुशंसा में तथा राष्ट्रीय एकता परिषद और राष्ट्रीय पुलिस आयोग की छठीं रिपोर्ट में पुलिस की संदिग्ध भूमिका सामने आई है। जब-जब साम्प्रदायिकता की आग भड़कती है तब-तब पुलिस की संदिग्ध भूमिका सामने आई लेकिन किसी भी सरकार ने पुलिस के दुराचार के खिलाफ शिकायतें सुनने के लिए कोई संस्थागत व्यवस्था नहीं की।आयोग- 1961 से एक के बाद एक आयोग बना, सभी ने पुलिस को दोषी करार दिया। 1961 में जबलपुर, सागर, दामोह और नरसिंहपुर में हुए दंगों पर जस्टिस श्रीवास्तव जांच आयोग ने अपने अध्ययन में पाया कि इंटलिजेंस डिपार्टमेंट पूरी तरह अयोग्य है और लॉ एण्ड ऑर्डर अधिकारियों की जांच प्रक्रिया में लापरवाही की वजह से ही अपराधी अभियोग से छूट जाता था।1967 में रांची, सोलापुर, मालेगांव, अहमदनगर, जयपुर के दंगे हो या फिर अहमदाबाद के 1969 के दंगे सब में यही पाया गया कि इन दंगों को रोकने में पुलिस की भूमिका कमजोर होने के साथ-साथ पक्षपातपूर्ण थी। 1970 के भिवंड़ी, जलगांव और महद के दंगों में न्यायमूर्ति मदन आयोग ने यह पाया कि पुलिस ने न केवल दंगाइयों को संरक्षण दिया बल्कि रिपोर्ट दर्ज करते समय गलत रिपोर्ट दर्ज की कि दंगाई मुसलमान थे न कि हिन्दु। जो हिन्दु दंगाई शिवसेना से सम्बंध रखते थे उन्हे विशेष दर्जा देकर उनके केस ही खत्म कर दिये।1982 में मेरठ में हुए दंगों की जांच कर रहे एन सी सक्सेना ने पाया कि पुलिस के कुछ अधिकारी यह कह रहे थे कि मुसलमानों को सबक सिखाना जरूरी है। जिसका पीएसी और पुलिसवालों ने पूरी तरह से पालन किया और दंगाइयों को खुली छूट दे दी।राष्ट्रीय पुलिस आयोग की छठी रिपोर्ट 1981 में यह साफ उल्लेख है कि पुलिस व्यवस्था एक विशेष समुदाय के साथ होती है और वह दंगों में नियंत्रण नहीं कर पाती जिससे उसकी छवि पर कई प्रश्न उठते हैं।दिल्ली 1984-- 1984 के सिक्ख दंगों के दौरान पुलिस की भूमिका पर, दिल्ली की अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर विशेष रूप् से काम किया है और ऐसा ही अध्ययन 1992 के मुस्लिम दंगों पर बम्बई के शक्ति अहमद और ज्योति पुनवानी ने किया है।न्यायमूर्ति मिश्रा आयोग ने 84 के सिक्ख दंगों को देखते हुए पुलिस की निन्दा की और स्पष्ट कहा कि यह न केवल हिंसा को नियंत्रित करने में नकारा साबित हुई है, बल्कि उसके लिए माहौल भी तैयार किया है और बाद में जांच पर लीपा पोती कर दी है। पुलिस खुद भी हिंसा फैलाने में लगी हुई थी। जान बचाने के लिए हथियार उठाने वाले सिक्खों से हथियार छीन लिए। पुलिस वाले भीड़ के साथ मिलकर चल रहे थे। एफआईआर या तो दर्ज नहीं की गई और जो लिखी गई वह भी गलत थी। ज्यादातर बयानों में कहा गया कि गवाह भीड़ में चेहरा नहीं पहचान सका, लेकिन प्रमाण जुटाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए गये।मिश्रा रिपोर्ट के बाद दिल्ली प्रशासन ने नयायमूर्ति कपूर और के. एल. मित्ताल समिति गठित की, जिसकी विस्तृत रिपोर्ट को सरकार ने जनता के सामने नहीं आने दिा और न ही कोई कार्यवाही की गई।इसके बाद जैन-अग्रवाल समिति ने भी यही पाया कि पुलिस के आला अधिकारी अपनेर् कत्ताव्यों से हट रहे हैं। एफआईआर में जिन लोगों के नाम लिखे थे उन अभियुक्तों को छोड़ दिया गया।नानावती आयोग में रामजेठमलानी ने तत्कालीन गृहमंत्री पी.वी. नरसिंहराव आक्षेप लगाते हुए कहा कि उन्होंने इस विषय में कोई रुचि नहीं दिखाई। खुशवंत सिंह और जयाजेटली ने भी पुलिस पर आरोप लगाया कि वे चुपचाप लूट का तमाशा देख रहे थे। दंगाइयों को पुलिस का कोई डर नहीं था।न्यायालय ने भी सिक्ख दंगों से सम्बन्धित विभिन्न विवादों जैसे-राज्य बनाम अब्दुल अज़ीज विवाद, राज्य बनाम कनक सिंह विवाद, राज्य बनाम अशोक और राज्य बनाम रामपाल सरोज विवाद में पुलिस को गैर जिम्मेदार और हिंसा में सहायक पाया।मुम्बई 1992 ने निर्दोष मुस्लिमों की हत्याओं के लिए, बी.एन. कृष्णमूर्ति रिपोर्ट में पुलिस के आला अधिकारियों को दोषी पाया गया जिन्होंने न केवल साम्प्रदायिक दंगे और हिंसा को भड़काने में सहयोग दिया बल्कि हिंसक भीड़ पर गोलियां चलाई और अब्दुल रजाक और शाइक की मौत का भी कारण बना। उसने तलवार लेकर न केवल शिव सेना का साथ दिया बल्कि एक 18 वर्षीय लड़की का अपहरण और अपाहिज आदमी की बेरहमी से हत्या भी कराई। लेकिन किसी भी पुलिस अधिकारी को एक दिन की भी सजा तक नहीं हुई। विभागीय जांच का जामा पहनाकर, सजा को भी मजाक बना दिया गया। सजा के नाम पर या तो रैंक में या फिर वेतन वृध्दि में कटौती कर दी गई। बहुत से फौजदारी मुकदमों में भी एफआईआर तक दर्ज नहीं की गई। इस तरह विभागीय जांच में दण्ड से या तो मुक्त कर दिया गया या बहुत कम सजा दी गई और अपराधिक जांच में तो अभियोग लगाया ही नहीं गया।इन आयोगों की रिपोर्ट को कचरे के डिब्बे में डाल दिया गया। जांच आयोग अधिनियम 1952 के तथ्यों का सरकार ने इस प्रकार अर्थ लगाया कि वह इन रिपोर्टों को मानने के लिए बाध्य नहीं है। जबकि इसका अर्थ है कि किन्हीं अच्छे कारणों के कारण सरकार इन रिपोर्टों को अस्वीकार कर सकती है। धारा 14 के अनुसार एक बार इन्हें स्वीकार लेने पर सरकार किसी भी कारण का बहाना नहीं बना सकती वह आयोग की रिपोर्ट के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है।संविधान का अनुच्छेद 311 (2) सरकार को किसी भी सरकारी पदाधिकारी को बिना विभागीय जांच के पदच्युत करने का अधिकार देता है, यदि राष्ट्रपति या राज्यपाल भी इस बात से सहमत हों कि ऐसी किसी जांच की आवश्यकता नहीं है, वहां पदच्युति की शक्ति पूरी तरह सरकार के हाथ में है।अब समय आ गया है कि ऐसी साम्प्रदायिक हिंसा में लिप्त पुलिस के आला अफसरों को सबक सिखाया जाए। जांच आयोग के प्रतिवेदन पर उन्हें पद से हटा दिया जाना चाहिए। विभागीय जांच या तो की नहीं जानी चाहिए या फिर उन्हें केवल आला अफसरों पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। बल्कि एक विशेष अनुशासनिक बोर्ड बनाया जाना चाहिए जिसमें पुलिस-अफसरों के साथ गैर पुलिस अफसर भी शामिल हो और कार्यवाही जनता के सामने होनी चाहिए। पुलिस अफसरों के लिए केन्द्र सरकार को एक विशेष सैल बनानी चाहिए।सोचने के लिए इतना ही नहीं है कि न्यायिक प्रशासन बिखर रहा है बल्कि इससे भी ज्यादा तो संवैधानिक व्यवस्था का पतन हो रहा है। कानून का क्रियान्वयन करने वाली मुख्य एजेंसी ही लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ खतरा बन गई है यही समय है चेतने का। अब केवल न्यायाधीश ही नया और प्रभावशाली कानून लागू करके, साम्प्रदायिक हिंसा में लिप्त पुलिस अफसरों को सबक सिखा सकते हैं।अनुवाद-मीनाक्षी अरोरा
अन्याय के खिलाफ जनता का हथियार -- गोपालकृष्ण गांधी
साभार: पीएनएन हिन्दी .कॉम
सूचना का अधिकार कानून बन चुका है। बढ़िया कानून है। बहादुर कानून है। हर प्रदेश में लागू हो गया है। एक बड़े आंदोलन की इस कानून में फतह हुई है। इस कानून ने कइयों को इंसाफ दिलाया है, कई गफलतों, गलतियों, घूस और घोर अन्यायों का मुकाबला किया है। इस सबके बावजूद भी इस सूचना के अधिकार अभियान की जरूरत महसूस हुई है। वजह यह है- यह कानून जो कि भारतवासियों के कानों तक पहुंचने को था, कइयों के कानों तक पहुंचा जरूर है, पर कई औरों-करोड़ों- के कानों के ऊपर-ऊपर से सरसराता हुआ प्रवेश कर गया है दफ्तरों में। इस बात में वैसे कोई खराबी नहीं। दफ्तरों के बिना कोई कानून नहीं चलता। लेकिन दफ्तरों का एक अजीब तरीका होता है। वे कानूनों को अपने कूचे में मेहमान बना देते है। दफ्तरों की कोशिश होती है कि कानून को इज्जत मिले। लेकिन इस इज्जत के बारे में गलतफहमी रहती है। कुछ दफ्तर समझते हैं कि कानून को इज्जत देने का मतलब है, कानून को कम से कम तकलीफ हो, ज्यादा से ज्यादा आराम। लेकिन सूचना के अधिकार का यह कानून आराम के लिए नहीं बना है। काम के लिए बना है। उसे मेहनत चाहिए, राहत नहीं। दफ्तरों को कानून में घर बनाना चाहिए, न कि कानून को दफ्तरों में। कानून को दफ्तरों में सिर्फ उतनी ही देर के लिए रहना पसंद है जितना कि तीर को तरकश में।मैं भाषण देना नहीं चाहता। भाषणकार दफ्तरों से भी ज्यादा कानूनों को अपने वश में कर लेते है। मैं तीन तबकों को संक्षेप में संबोधित करूंगा- सरकारों को, अभियान को और अंत में उनको जिनके लिए यह अधिनियम और यह अभियान खड़ा हुआ है, यानी आम पब्लिक को।सूचना के अधिकार कानून का एक बड़ा जिम्मा सरकारी प्रबंधकों पर आया है। अहम् जिम्मा है। उनको मैं कहूंगा यह कानून आपके हाथ का हथियार है, आपके सामने खतरा नहीं। उसकी नोक आपके सीने पर नहीं टिकी, आप उसकी नोक पर टिके है। उसके साथ आगे बढ़िए और सुशासन को बढ़ाइए। उससे डरिए मत, उससे खिसकिए मत, उसे अपनाइए, उससे एक हो जाइए उसकी मदद से हकीकत को जानिए, पहचानिए, दुरुस्त कीजिए। सदियों से हिंदुस्तान में ही नहीं, सब जगह सरकारी दफ्तर खुद को जनता की आलोचना से बचाने के आदी हो गए है। यह कुदरती बात है। लेकिन सरकारी दफ्तर और सरकारी कुर्सियां देश के हित के लिए बनी है, न कि अपने खुद के हित के लिए। जब भी इस एक्ट के तहत पब्लिक से कोई सवाल आता है तो सरकारी दफ्तरों को उसका स्वागत करना चाहिए और उसका पूरा, सही और सच्चा जवाब बुलंद अल्फाज में देना चाहिए। ऐसे अल्फाज में, जिसमें ध्वनि 'जय दफ्तर' की नहीं, 'जय तथ्य', 'जय सत्य' की, और 'जय हिंद' की हो।यह हमारी खुशनसीबी है कि वजाहत हबीबुल्ला जैसी ऊंची शख्सियत वाले इन्सान आज हमारे मुख्य सूचना आयुक्त है। प्रदेशों में भी काबिल और कर्तव्यपरायण आयुक्त इस काम में लगे है। उनको वह सारी सुविधाएं और सम्मान दीजिए, जो कि उन्हें मिलनी चाहिए। आरटीआई अधिकारियों को इसके लिए इंतजार करना पड़े, यह सरकारों की छवि के लिए ठीक नहीं।गोपनीयता का एक अहम् सवाल है। इस कानून में गोपनीयता की सुरक्षा हुई है। होनी चाहिए। जैसे हम है, वैसा ही देश है। हमें-हम सबको-कुछ मामलों में गोपनीयता की जरूरत होती है या नहीं। कुछ ऐसे रिश्ते होते है, जहां गोपनीयता जरूरी होती है। सरकार और देश के रिश्तों में भी कुछ ऐसे क्षण होते है, जहां गोपनीयता आवश्यक बन जाती है। वह कुछ नजाकतों की हिफाजत के लिए होती है। खुलेपन का मतलब यह नहीं कि हम इन नजाकतों को भूल जाएं। लेकिन छिपने-छिपाने के लिए ऐसी गोपनीयता का इस्तेमाल सही नहीं। गोपनीयता का यह मतलब नहीं कि उसके तर्क में, उसकी तहों में, ऐसी बातों को, जो कि गोपनीय नहीं, गुम कर दिया जाए।फाइल नोटिंग की बात है। मैं सिर्फ इतना कह दूं, नोटिंग करते हुए आप मुद्दे के बारे में सोचें। हकीकत को ध्यान में रखिए। नोट्स यह सोचते हुए लिखने की कोशिश न कीजिए कि 'कहीं आगे जाकर कानून वाली तकलीफ न हो जाए'। और न ही ऐसे नोट्स लिखने की कोशिश कीजिए जिससे इस कानून के तारामंडल में आप एक चमकता सितारा बन जाएं।दूसरे तबके से...।दूसरा तबका है कानून के निर्माताओं, समर्थकों और उसके प्रचारकों का। उन्होंने बहादुरी, धीरज और एकाग्रता से इस कानून के लिए आवाज उठाई। यह मेरी समझ में, हमारे संविधान की रचना के बाद, सबसे अहम रचना है। आपको आज मुबारकबाद मिला है- आगे जाकर उससे भी ज्यादा शुक्रगुजारी दी जाएगी। लेकिन यह काम 'शुक्रिया' सुनने के लिए नहीं किया है। सि(ांत के लिए किया है।नौकरशाही कानून के मामले में अपनी पुरानी मानसिकता से अभी बाहर आना सीख रही है। सदियों से, अफसरों ने ठकुर-सुहाती सुनी है।आजादी के साठ साल बाद अफसरों को सीधे सवालों को अपनाना पड़ रहा है। यह इस कानून की एक इंकलाबी कामयाबी है। आरटीआई की जिम्मेदारियों में, अफसरों को एक नए तजुर्बे का अब एहसास हो रहा है। आरटीआई के प्रसंग में नौकरशाही को आप अभी एक छात्र के रूप में देखिए। शिक्षक है, आरटीआई कानून उसके निर्माता, समर्थक, अभियान से जुड़े लोग- सह-शिक्षक है।अफसर को धमकाइए मत, उसे समझाइए, उत्साहित कीजिए। 'अफसर और उत्साह? नामुमकिन!' यह ख्याल मैं कइयों से सुनता हूं। यकीन कीजिए, मैंने अफसरों में बहुत उत्साह देखा है आप चाहें तो उदाहरण भी दे सकता हूं। जब वह कुर्सी से उठने की कोशिश कर रहा है, उसको यह मत कहिए कि 'चल उठ, सर पर खड़े हो'। वह एक बड़ा पहलू सीख रहा है विश्वसनीयता और पारदर्शिता शासन में, शीर्षासन में नहीं।अभियान के लिए एक और बात-गांधीजी ने दिसंबर 30, 1926 के दिन यंग इंडिया में लिखा था-'दोज हू सीक जस्टिस मस्ट कम विद क्लीन हैंड्स।' 'क्लीन हैंड्स' के कई मतलब है। इसका एक अर्थ तो यह है कि इस कानून का उपयोग करने वाले को यह बताया जाए कि वह जिम्मेदारी के साथ इसका इस्तेमाल करे। गंभीर सवालों को उत्साहित और छिछोरे सवालों को हतोत्सािहत करना चाहिए। जो गैर सरकारी संगठन इस कानून के प्रचार में लगे है उन्हें भी सवालों के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्हें खुद के हिसाब-किताब खुले रखने चाहिए-हालांकि यह कानून उन पर लागू नहीं।अभियान से जुड़े लोगों से...अभियान से जुड़े लोगों को मैं यह भी कहूंगा कि आपको अपने लक्ष्य में विश्वास हो, यह जरूरी है। साथ ही आप जिस सुधार के लिए आग्रही बने है, उस सुधार की पूरी सफलता की संभावना में भी पूरा विश्वास रखना जरूरी है, बल्कि बहुत जरूरी है।यह अभियान निर्मल जल की तरह है। निर्मलता निर्बलता नहीं। अभियान को अपनी निर्मलता के प्रचार से बल मिलेगा। सवाल भेजने वालों के उद्देश्य और उनके आधार साफ हों, यह आवश्यक है। महादेवी वर्मा ने 'अतीत के चलचित्र' में लिखा है- 'कीचड़ से कीचड़ को धो सकना न संभव हुआ है न होगा, उसे धोने के लिए निर्मल जल चाहिए।''सत्याग्रह' शब्द को इस अभियान से जोड़ा गया है। इससे अभियान का काम बड़ा बनता है और मुश्किल भी। गांधी के औजार बल देते है और दायित्व भी। अभियान से जुड़े लोगों को अगर सत्याग्रह करना है तो फिर सत्याग्रह के दायित्वों को समझना होगा।आचार्य कृपलानी ने 1948 में कहा था, 'बिहार में हम लोग काम करते थे तो मेरे विद्यार्थी भी मेरे साथ थे। एक दिन देखा तो कुछ विद्यार्थियों के बदन पर कुर्ता नहीं था, सिर्फ छोटी सी धोती और चादर थी। मैंने कारण पूछा। उन्होंने कहा, 'बापू आजकल कुर्ता नहीं पहनते, इसलिए हम भी नहीं पहने।' मैंने उनसे कहा, 'भूखे और नंगे आदमियों को देखकर कुर्ते से बापू के शरीर में जलन होती थी, आग-सी लग जाती थी, उससे बचने के लिए उन्होंने कुर्ता उतारकर फेंक दिया। तुम्हारे शरीर में वैसी जलन नहीं होती। तुम्हें कुर्त फेंकने की जरूरत क्या है?''बापू के मार्ग पर चलने का मतलब यह नहीं है कि हम उनकी नकल उतारें। कुछ लोग तो बापू की नकल उतारने में अपने को बापू से भी बढ़ा-चढ़ा दिखलाने की कोशिश करते है। एक तरह से दुनिया पर जाहिर करना चाहते हैं कि गुरू गुड़ रह गए, चेला चीनी बन गया। हम खबरदार रहें। अपने को ऊंचा और पवित्र समझने वालों की एक जमात न बना लें। हमें गांधीजी की भावना की तरह काम करना है, किसी बाहरी चीज का अनुकरण नहीं करना है। सत्य और अहिंसा के रास्ते चलने वाले को समझ लेना चाहिए कि यह रास्ता शहीद होने का रास्ता है। यह सही है कि अभियान से जुड़े लोग कभी अपने को 'चीनी' नहीं समझेंगे। लेकिन यह काफी नहीं, उन्हें 'गांधी का गुड़' लेकर चलना होगा। 'गांधी का गुड़' यानी सादा सच। कड़वा या मीठा सच नहीं। सादा सच सिर्फ सच।उन्नीस सौ बाइस में जब चौरी-चौरा में 22 सिपाहियों का कत्ल हुआ तब गांधीजी ने सत्याग्रह को रोक दिया था। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि 'महात्मा गांधी की जय' के नारों के बीच कत्ल हुए थे। इसलिए मंजिल से कम नहीं है वहां पहुंचने के तरीकों की सफाई। इस कानून को सफल बनाने के लिए सत्य पर आग्रह जरूरी है और तरीकों पर भी ध्यान देना आवश्यक है। आरटीआई एक्ट का उपयोग करिए, दुरुपयोग नहीं। अफसर को तंग करने के लिए उसका इस्तेमाल कतई मत करिए। यह कानून अफसरों को सड़क की धूल से वाकिफ बनाने के लिए है। उनकी नाकों को उस धूल में रगड़ने के लिए नहीं। किसी व्यक्ति के मान या किसी पद की गरिमा को घटाने के लिए उसका इस्तेमाल मत कीजिए। सरकारी कर्मचारी भी जनता का हिस्सा है-उनको भी मैं कुछ कहना चाहूंगा-सेवा संबंधी मामलों के लिए कृपया आप आरटीआई एक्ट को मत उठाइए। आपके पास और रास्ते है-जैसे कि ट्रिब्यूनल।यह कानून मूलत: उन लोगों के हित के लिए बनाया गया है जो साधारणत: मूक है, जिनके दिलों में सवाल उठ रहे है, उबल रहे हैं, भ्रष्टाचार के, कुशासन के। यह कानून मूल में उनके लिए है। उनके लिए कानून की लाइन स्पष्ट होनी चाहिए। सरकारी कर्मचारियों के निजी मामलों से आरटीआई के टेलीफोन व्यस्त नहीं रहना चाहिए।यह कानून न कोई देवता है, न जिन्न। वह एक सच्चा, सुथरा और सभ्य साधान है-समाज में सच्चाई, सुथरेपन और सभ्यता को बढ़ाने का एक सही साधन। आरटीआई कानून को पूजिए मत, न ही उससे किसी को डराइए। उससे शासन में, समाज में विश्वसनीयता बढ़ाइए।यह कानून एक करार है, कड़ा करार। करारों को कागज पर छोड़ दिया जाए तो वह कागज बन कर रह जाएगा। यह अभियान इस आरटीआई कानून के करार को कागज से ऊपर हिंदोस्तान की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ने के लिए है।मैं समझता हूं, उसकी सबसे बड़ी कामयाबी होगी भ्रष्टाचार से मुकाबला करने की। हमारे जमाने का तानाशाह है रुपया। रुपया भी कागज का है। पर देखिए उसकी ताकत। अगर रुपया नाम का कागज खेल खेलता है तो यह कानून का 'कागज' भी टीम इंडिया बन जाए!उन्नीस सौ इक्कीस को राजाजी को वेलूर जेल में कैद रखा था। स्वराज के सैनानी थे। लेकिन स्वराज के बारे में उनके ख्याल पढ़ने लायक है। स्वराज से 25-26 साल पहले स्वराज के बारे में लिखा था, 'हमें यह समझ लेना चाहिए कि स्वराज तुरंत नहीं मिलने वाला। मैं सोचता हूं कि इसमें भी लंबा समय लगेगा। हमें बेहतर सरकार और जनता की खुशहाली के लिए काम करना चाहिए। जैसे ही हमें स्वतंत्रता मिलेगी चुनाव और भ्रष्टाचार, अन्याय और सत्ताा तथा प्रशासन की अकुशलता से जीवन नर्क बन जाएगा।'इन सब मसलों से जूझने के लिए संस्थाएं है- अदालतें है, चुनाव आयोग है, सतर्कता आयुक्त है। आरटीआई कानून उन सब संस्थाओं के काम में सहायक बने, जन-सतर्कता के माध्यम से- यह अभियान का उद्देश्य होना चाहिए। सरकार, गैर-सरकारी इकाइयां और जनता, तीनों साथ-साथ सत्य की पटरी पर चलें। तब ही आरटीआई कानून को सफलता मिलेगी। गांधी ने लोगों को आवाज दी थी। शहीद भगत सिंह ने बंद कानों को खोला था। आरटीआई कानून का राष्ट्रीय अभियान यही काम करे। ऐसा मेरा विश्वास है।सूरदास के शब्दों में-जाके कृपा पंगु गिरि लंघै,अंधौ को सब कछु दरिसाई।बहिरौ सुनै, गूंग पुनि बोले,रंक चलै सिर छत्र धराई॥(लेखक पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और महात्मा गांधी के पौत्र है)
(नई दिल्ली के तीन मूर्ति भवन में सूचना के अधिकार कानून के लिए राष्ट्रीय अभियान में 29 सितंबर 07 को दिए गए उद्बोधन के संपादित अंश।)
जायजा राज्यों का - सूचना के अधिकार कानून लागू करने में भी मनमर्जी
जायजा राज्यों का - सूचना के अधिकार कानून लागू करने में भी मनमर्जी
राज्य सरकारें सूचना के अधिकार के राष्ट्रीय कानून को मनमर्जी से लागू कर रही हैं। अभी तक राज्य सरकारों को दी कई जिम्मेदारियां पूरी नहीं हुई हैं। इस कानून के बारे में लोगों को जानकारी तक नहीं है। अनेक राज्यों में जनता, कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए न तो प्रशिक्षण मॉडयूल बने हैं। न ही प्रशिक्षण आयोजित किए गए हैं। राज्य सरकारें सूचना आयुक्तों को पूरी सुविधाएं नहीं दे रही हैं। कई राज्यों में सूचना मांगने व निरीक्षण करने की मनमानी फीस वसूली जा रही है। समय पर अपीलों की सुनवाई नहीं होती। अपनी पहल से धारा 4 के तहत सूचना नहीं दी जा रही। सूचना मांगने वालों को धमकाया जाता है। आमजन सरकारी दफ्तरों में जाने से डरते हैं। देशभर में सूचना के अधिकार को लेकर बहुत कम संस्था संगठन काम कर रहे हैं। ये जानाकारियां सूचना के अधिकार के राष्ट्रीय अभियान के एक आंकलन से पता चली हैं। इस अभियान ने 17 राज्यों के सूचना के अधिकार के सहयोगी समूहों को एक प्रश्नावली भेजी थी। उनसे इसे भर कर भेजने को कहा गया था। इसी प्रश्नावली से यह जानकारी मिली है।पिछले दो सालों में सूचना के अधिकार कानून की स्थिति का आंकलन करने के लिए सूचना के अधिकार के राष्ट्रीय अभियान ने 28 से 30 सितम्बर को दिल्ली में एक कार्यशाला आयोजित की थी। इससे कई जरूरी जानकारियां मिली हैं।अभियान के द्वारा केन्द्र व 16 राज्यों ;आसाम, बिहार, छत्ताीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, झारखण्ड, केरल, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, मणिपुर, महाराष्ट्र, नागालैण्ड, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तार प्रदेश, तमिलनाडू व पश्चिम बंगालध्द से यह सूचनाएं एकत्रित की गर्इं। कुल 17 जगहों की सूचनाओं को संकलित किया गया। इस संकलन से कुछ अहम तथ्य जो उभर कर आए वो हैं:· कुछ राज्यों में मनमर्जी से आवेदन की फीस ली जा रही है। कानून में 10 रुपए फीस तय की गई है। गुजरात में 20 रुपए व तमिलनाडू में 50 रुपए फीस ली जा रही है। बाकी सभी राज्यों में 10 रुपए ही लिए जा रहे हैं।· कानून में फोटो कॉपी के लिए हर पन्ने के 2 रुपए लेने का नियम है। सभी राज्यों में इसी के अनुसार लिए जा रहे हैं।· रिकॉर्ड के निरीक्षण के लिए एक्ट में पहले घण्टे में कोई फीस नहीं ली जाती है। उसके बाद हर आधे घंटे की 5 रुपए फीस लगती है। राज्यों से आई सूचना के अनुसार छत्ताीसगढ़ व मध्यप्रदेश में पहले घंटे में 50 रुपए फीस ली जा रही है। उत्तार प्रदेश में 10 रुपए। बाकी सभी जगह कोई फीस नहीं ली जा रही है। एक घंटे के बाद के समय के लिए गुजरात व कर्नाटक में आधे घंटे के 20 रुपए लिए जा रहे हैं। बाकी जगह 10 रुपए लिए जा रहे हैं।· एक्ट के अनुसार प्रथम अपील की कोई फीस नहीं लगती। छत्ताीसगढ़ व मध्यप्रदेश में 50 रुपए, महाराष्ट्र व उड़ीसा में 20 रुपए तथा बिहार में इस काम के 10 रुपए लिए जा रहे हैं। बाकी राज्यों में कोई फीस नहीं ली जा रही।· द्वितीय अपील की भी कोई फीस नहीं है। छत्ताीसगढ़ व मध्यप्रदेश में 100 रुपए उड़ीसा में 25 रुपए, महाराष्ट्र में 20 रुपए तथा बिहार में 10 रुपए लिए जा रहे हैं। बाकी राज्यों में कोई फीस नहीं ली जा रही है। सीडी के लिए सभी जगह 50 रुपए फीस ली जा रही है।· बड़े पेपर पर सूचना की फोटोकॉपी के लिए वास्तविक मूल्य के अनुसार पैसे लिए जा रहे हैं। छत्ताीसगढ़ में बी.पी.एल. कार्डधारियों की व्यक्तिगत सूचना मुफ्त दी जा रही है। अन्य लोगों से 50 पन्नों के लिए 10 रुपए लिए जा रहे हैं।· नकद, डीडी, चालान, चेक, नॉन ज्यूडिशल स्टेम्प पेपर, बैंक पे ऑर्डर, पोस्टल आर्डर आदि से पैसे लिए जा रहे हैं।· मध्यप्रदेश राज्य में प्रथम अपील की दो प्रतियां और दूसरी अपील की अर्जी की 3 प्रतियां ले रहे हैं। कहीं पर छपे हुए फार्मों पर अपील ली जा रही है।· अपील की सुनवाई में ज्यादातर राज्यों में 45-50 दिन लग रहे हैं लेकिन छत्ताीसगढ़ में दो महीने लग रहे हैं।· 7 राज्यों ;बिहार, छत्ताीसगढ़, दिल्ली, मध्यप्रदेश, नागालैण्ड, उत्तारप्रदेश, पश्चिम बंगालध्द में कोई टे्रनिंग मॉडयूल नहीं है। कर्नाटक व तमिलनाडू से कोई जवाब नहीं मिला है। बाकी 8 राज्यों में प्रशिक्षण की कोई न कोई व्यवस्था है और इसकी पुस्तिका भी निकाली गई है। बिहार, दिल्ली, उत्तारप्रदेश, पश्चिम बंगाल में अभी तक कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया है। केरल में सबसे ज्यादा प्रशिक्षण कार्यक्रम हुए हैं।· मध्यप्रदेश के अलावा किसी भी राज्य में सूचना मांगने वालों को परेशान करने की बात सामने नहीं आई है।· राज्य सूचना आयोग की स्थापना सब जगह हो गई है। लेकिन इसे शुरू किए जाने की तारीख हर जगह अलग-अलग है। इसी तरह पहली अपील सुनने की तारीख भी सब जगह अलग अलग है। 2006 में सभी राज्यों में इस कानून की क्रियान्विति शुरू हो गई थी।· सूचना के अधिकार के तहत आने वाली अर्जियों के रिकॉर्ड रखने व उन्हें व्यवस्थित करने का तरीका अभी सब जगह नहीं बना है। बिहार, दिल्ली, झारखण्ड, नागालैण्ड, उत्तारप्रदेश, पश्चिम बंगाल में ऐसी कोई व्यवस्था अभी नहीं बनी है।· लोक सूचना अधिकारी व उप लोक सूचना अधिकारी की नियुक्ति या पदनाम सभी जगह हो चुका है। किन्तु दिल्ली, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर व राजस्थान में सब जगह इन तक पहुंचना आसान नहीं है। कहीं कहीं इनसे मिलने के लिए पास बनवाना पड़ता है। कौन व्यक्ति कहां अधिकारी है इसकी सूची आसानी से कहीं भी नहीं मिलती। फोन नम्बर भी नहीं मिलते।· धारा 4 के तहत खुद देने वाली सूचना भी बहुत कम जगह उपलब्ध हैं। उड़ीसा के अलावा कहीं भी यह सूची उपलब्ध नहीं है।· केरल, मणिपुर व उड़ीसा में एकल खिड़की योजना से सारी जानकारी दी जाती है। अन्य राज्यों में यह सुविधा नहीं है।· आसाम, नागालैण्ड, उड़ीसा व राजस्थान में लोक सूचना अधिकारी मदद करते हैं जबकि अन्य राज्यों में मदद में परेशानी आती है।· आसाम, बिहार, नागालैण्ड व राजस्थान में आमतौर पर सूचना मिल जाती है लेकिन समय सीमा के अंदर बस उड़ीसा व राजस्थान में ही सूचना मिल पाती है।· छत्ताीसगढ़ में पहली अपील की सुनवाई में दो महीने लगते हैं। झारखण्ड में 25( मामले ही समय पर निबटते हैं।· 13 राज्यों में रिटायर्ड आई.ए.एस., 3 में उच्च न्यायालय के रिटायर्ड न्यायाधीश तथा 1 पुलिस अधिकारी को सूचना आयुक्त बनाया गया है।· आसाम, छत्ताीसगढ़ गुजरात व नागालैण्ड के लोगों के सर्वेक्षण के नतीजों से पता चला है कि उन्हें सूचना आयुक्त पर विश्वास है। अन्य राज्यों के लोगों को उनपर विश्वास नहीं था।· चार राज्यों में द्वितीय अपील में 45 दिन, 4 में 90 दिन, 1 में 4 महीने तथा 8 राज्यों में 6 महीने से भी ज्यादा का समय लगता है। अंतिम निर्णय में भी काफी समय लग जाता है।आसाम, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान के अलावा सभी जगह समय पर सूचना नहीं देने पर पेनेल्टी लगाई गई। सभी राज्यों में काफी बड़ी मात्रा में द्वितीय अपील लगाई जा रही है और उनके निस्तारण में लम्बा समय लग रहा है।- प्रस्तुति : रेणुका पामेचा
Friday, 16 November 2007
स्म्र्ती विशेष
ऋचा शुक्ला
अभी इन्डिया
Thursday, 15 November 2007
रिश्ते का स्वांग
गर्ल फ्रेंड नहीं बन पायी तो
बहन के रिश्ते का
लोग डींगे
कुछ लोग
कुछ लोग सीख दे जाते है
पास बुला कर दूर कर जाते है
एहसास का होना ना होना बराबर करा जाते है
अपने लिए खाई का मुह खोल जाते है
कुछ लोग सीख दे जाते है
जरूरतमंद के लिए दरवाजा बंद करा जाते है
कुछ लोग सीख दे जाते है
अभी इण्डिया
सुनील कुमार आलेडिया
(संपादक)
